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भारत में कैंसर

cancer in india

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कैंसर भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या है। आई.सी.एम.आर. के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के प्राक्कलनों के अनुसार, भारत में किसी भी समय पर कैंसर के लगभग 28 लाख मामले हैं और लगभग 11 लाख नए मामले प्रत्येक वर्ष आते हैं। लगभग 5 लाख रोगी बीमारी के कारण प्रतिवर्ष मरते हैं। यह चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कैंसर मृत्यु का विश्व स्तर पर प्रमुख कारण है, जो 2008 में 7.6 मिलियन मौतों (सभी मौतों का लगभग 13 प्रतिशत) के लिए जिम्मेदार है। 2008 में कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 70 प्रतिशत कम और मध्यम आय वाले देशों में हुआ। विश्व स्तर पर कैंसर से होने वाली मौतों के बढ़ते रहने, 2030 में अनुमानित 13.1 मिलियन मौतों के साथ, का अनुमान किया गया है।

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गर्भाशय-ग्रीवा (गर्भाशय) और स्तन का कैंसर महिलाओं में सर्वाधिक सामान्य कैंसर है जबकि पुरुषों में, मुख-विवर, ग्रसनी और जठरांत्र पथ (पेट, इत्यादि) का कैंसर सामान्य हैं। स्तन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। दिल्ली एवं मुम्बई में स्तन कैंसर महिलाओं में सर्वाधिक सामान्य कैंसर है।

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कैंसर कैसे होता है

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देश के अंदर भी, विभिन्न प्रकार के कैंसर होने के प्रकारों में भौगोलिक विभिन्नता है। उदाहरण के तौर पर; उत्तर पूर्वी राज्यों में, फेफड़े और पेट कैंसर की घटनाएं देश के अन्य भागों से बहुत ज्यादा हैं। पित्ताशय कैंसर की घटनाएं उत्तरी और कुछ उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में अधिक हैं। स्तन कैंसर महानगर क्षेत्रों में सर्वाधिक सामान्य कैंसर है, जबकि गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं में अत्यन्त सामान्य है। एक और महत्वपूर्ण जानकारी जो एनसीआरपी द्वारा प्रदान की गई है वह यह है कि गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर को छोड़कर, जो वर्षों से अधोमुखी प्रवृत्ति दिखा रहा है, प्रॉस्टेट, स्तन, अंडाशय और गर्भाशय पिंड सहित कई अन्य कैंसर संख्या में बढ़ रहे हैं।

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सामान्य कोशिका से ट्यूमर कोशिका में रूपांतरण एक बहुस्तरीय प्रक्रिया, आम तौर पर कैंसर पूर्व के घावों से घातक ट्यूमर तक की प्रगति है। ये परिवर्तन किसी व्यक्ति के आनुवंशिक कारकों और बाह्य कारकों की तीन श्रेणियों के बीच अंतःक्रिया के नतीजे हैं, जिनमें शामिल हैं (क) भौतिक कैंसरकारी तत्व, जैसे कि पराबैंगनी और आयनित विकिरण (ख) रासायनिक कैंसरकारी तत्व, जैसे कि एस्बेस्टस, तम्बाकू धुएँ के घटक, एफ़्लैटॉक्सिन (एक खाद्य संदूषक) और आर्सेनिक (एक पेयजल संदूषक) और (ग) जैविक कैंसरकारी तत्व, जैसे कुछ वायरस, बैक्टीरिया या परजीवी से संक्रमण। ये सभी कारक, जिनमें से कुछ हमारे देश में विशिष्ट हैं, में गहन अनुसंधान की आवश्यकता है।

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30 प्रतिशत से अधिक कैंसर महत्वपूर्ण जोखिम कारकों को परिवर्तित करके अथवा कम करके रोके जा सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:

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  • तम्बाकू का उपयोग।
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  • अधिक वजन अथवा मोटापा होना
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  • फल और सब्जी का कम सेवन
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  • शारीरिक गतिविधि की कमी
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  • शराब का उपयोग
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  • यौन संचरित एचपीवी-संक्रमण
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  • शहरी वायु प्रदूषण
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  • ठोस ईंधन के घरेलू उपयोग से घर के भीतर धुआँ
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अधिकाधिक कैंसर अनुसंधान की आवश्यकता

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हमें तत्काल अपने देश में विशिष्ट विभिन्न कारणों को समझने की और विशेष रूप से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी जीवन शैली के अध्ययन की आवश्यकता है। गर्भाशय-ग्रीवा और सिर एवं गर्दन जैसे विभिन्न कैंसरों के उपचार में सुधार भारत के भीतर ही विकसित करना होगा, क्योंकि ये बीमारियाँ विकसित पश्चिमी दुनिया के लिए बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई हैं। कुछ कैंसर जैसे कि गर्भाशय-ग्रीवा, सिर एवं गर्दन, मुँह, पित्ताशय, यकृत, इत्यादि हमारे देश में अधिक प्रचलित और विशिष्ट हैं। इसलिए, हमें उनके कारणों और उपचार के लिए अधिक समझ और गहन अनुसंधान की आवश्यकता है।

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सामान्यतः कैंसर का प्रबंधन कारणों के प्रति हमारी समझ में सुधार, रोकथाम और शुरुआती पहचान और प्रबंधन के नए तरीकों के विकास के कारण तीव्र परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। हालांकि, कई अनुत्तरित प्रश्न अभी भी इस घातक रोग पर काबू पाने की खोज में शेष रहते हैं। अधिकतर कैंसरों के उन्नत चरणों में उपचार के परिणाम निराशाजनक रहे हैं, और इन्हें सुधारने की महती आवश्यकता है। सभी कैंसर रोगियों को इलाज की देखभाल के लिए और बाद में, इसके अनुवर्ती प्रभावों एवं पुनः घटित होने पर पर्यवेक्षण के लिए आजीवन जाँच की आवश्यकता है।

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जीनोमिक्स और आणविक विज्ञान में हालिया तकनीकी प्रगति ने, आणविक महामारी विज्ञान में अध्ययन के माध्यम से, कैंसर की शुरुआत, प्रसार और वृद्धि के आनुवंशिक और पर्यावरणीय घटकों के बारे में ज्ञान में बढ़ोतरी के लिए नई संभावनाएँ खोल दी हैं। कैंसर के कारणों एवं कार्य प्रणाली की और अधिक परिपूर्ण समझ इस बीमारी को रोकने के लिए अधिक प्रभावी तरीके उपलब्ध कराने में हमें समर्थ बनाएगी। विश्व स्तर पर भी, कैंसर नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक रणनीति विकसित करने के अलावा मानव कैंसर के कारणों और कैंसरजनन की कार्य-प्रणाली पर अनुसंधान पर अधिक ध्यान दिया गया है।

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वर्षों के अनुसंधान से पता चला है कि कई कैंसर मुख्य रूप से विशिष्ट जीनों में परिवर्तन के कारण और उनके जीनों की क्षति और उनकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन से कैंसर कोशिकाओं के अत्यधिक अव्यवस्थित व्यवहार से उत्पन्न होते हैं। यह समय है कि जीनोम अनुक्रमण, जीनोम वर्णन इत्यादि सहित जीनोम विश्लेषण तकनीकों के प्रयोग के माध्यम से कैंसर के आणविक आधार को समझने के लिए व्यापक और समन्वित प्रयास किए जाएं। इसी तरह, वैज्ञानिक प्रगति संभावित परिस्थितियों को बदलने और जोखिम वाले लोगों में कैंसर को रोकने के लिए दवाओं, टीकों और अन्य पदार्थों के संभावित उपयोग के लिए नए प्रमाण प्रदान कर रही है।

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चिकित्सा के नए मॉडलों जैसे कि जीन चिकित्सा इत्यादि को विभिन्न कैंसरों के लिए आजमाया जा रहा है। हमारे देश में भी, हमें जीनोमिक्स, प्रोटिओमिक्स, आणविक जीव विज्ञान, फार्माको-जीनोमिक्स, स्टेम सेल अनुसंधान, टीका विकास आदि जैसे कैंसर अनुसंधान के नए क्षेत्रों का पता लगाने के लिए और चिकित्सा के नए मॉडल जैसे कि जीन थेरेपी आदि को विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध अनुसंधान संस्थानों को विकसित करने की आवश्यकता है।

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